
यह इस कड़ी(मेरी शुरुवाती दिनों मैं लिखी गई कविताओ) की आखिरी कविता हैं ....यह कविता 13 दिसम्बर के दिन भारतीय अस्मिता (भारतीय संसद)पर हुए हमले पर आधारित हैं|इस कविता में एक आदमी के हालत को बयां किया गया जो उस हमले के वक्त वहाँ उपस्थित था ||
पेश हैं मेरी कुछ पंक्तियाँ...
चारो तरफ़ सन्नाटा था,
उठी एक गोली की आवाज़|
मैं भगा और देखा की कौन हैं यह जाबांज,
देखा तो पाया के थे यह आतंकवादी||
चारो तरफ़ फैलाना चाहते थे यह क्रूर बर्बादी|
जब तक मेरी समझ में आता,
और मैं कही भाग पाता||
तभी आया उनमे से एक,
बन्दूक उठाई मुझको देख|
जब वह मुझ पर गोली चलता,
उससे पहले कोई मुझे बचाना चाहता||
नई चल खेल गया विधाता|
उस पर चल गई थी गोली,
लग गई उसके प्राणों की बोली ||
वह हो गया ज़मीन पर ढेर|
क्योकि शेर को मिल गया सवा शेर ||
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